राष्ट्रगान के सुरकार कप्तान रामसिंह ठकुरी
गीत एक ऐसी विधा है जो बच्चे-बूढ़े सभी को आनंदविभोर कर देती है। गीत में अगर संगीत भी भरा जाए, तो उसमें चार चाँद लग जाए। गीत-संगीत को हर कोई पसंद करता है। कहा जाता है, जो संगीत पसंद नहीं करते, उन पर विश्वास नहीं किया जा सकता। गीत-संगीत को दिल से प्यार करनेवाले एक एक महान गोर्खा आज़ाद हिंद फौज के कप्तान थे। जी हाँ, आज हम बात करने जा रहे हैं कप्तान रामसिंह ठकुरी की। 15 अगस्तसन् 1914 के दिन हिमाचल प्रदेश के अन्तर्गत धर्मशाला नगर के सल्लाघारी गाँव में रामसिंह ठकुरी का जन्म हुआ था। बचपन से उन्हें संगीत में विशेष रुचि रहने के कारण पाँचवीं कक्षा तक की पढ़ाई के बाद उन्होंने संगीत जगत में प्रवेश किया था।
रामसिंह ठकुरी के पिताजी दिलीप सिंह ठकुरी २/१ गोर्खा राइफल्स में सेवारत थे और रामसिंह ठकुरी भी अपने पिता की तरह २/१ राइफल्स में रिक्रुट ब्वाय(boy) के तहत भर्ती हुए थे। उन्होंने अपने सैन्य जीवन के साथ-साथ संगीत जीवन को भी जीया। जब भी समय मिलता वे संगीत की चर्चा करते, धुनें बनाते, गीत के बोल लिखते। अपने अल्प वेतन से पैसे बचाकर उन्होंने एक वायोलिन खरीदा। उनका संगीत सुनकर सभी मोहित होते। बटालियन के बैण्डमास्टर सर्जेन्ट हडसन और डेनिस साहब ने संगीत के प्रति उनकी लगन और मेहनत को देखते हुए उनकीकाफी मदद की। इसी दौरान उन्होंने ब्रासबैंड, स्ट्रीटबैंड और डांसबैंड का भी प्रशिक्षण लिया।
रामसिंह ठकुरी बहु प्रतिभाशाली होने के साथ-साथ एक सच्चे देशभक्त भी थे। मनकी एकाग्रता, ईमानदारी, दृढ़ संकल्पऔर देश के प्रति निःस्वार्थ प्रेम के कारण वे प्रगति के शिखर पर चढ़ते गए। सन १९२८ में रिक्रुट ब्वाय के तहत भर्ती होकर वे सन १९३५ में लांसनायक पद पर पदोन्नत हुए। उसके पाँच साल बाद सन् १९४० में नायक और १९४१ में कम्पनी हवलदार मेजर के रूप में उनकी पदोन्नति हुई। पदोन्नति के बाद उन्हें सिंगापुर यूनिट में भेजा गया था। संगीत कर्म के प्रति उनका जबरजस्त लगाव था। इसीलिए एक सेना के कर्त्तव्य निभाने के उपरांत भी सांगीतिक क्षेत्र में नए-नए अच्छे कारनामें करते गए।
रामसिंह ठकुरी ने
कवि गुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा विरचित "जन-गण-मन" राष्ट्रगीत को अपने
संगीत से पिरोया था। जो राष्ट्र संगीत सुनकर हमारा तन-मन राष्ट्रप्रेम से भर जाता
है। जब तक ये संसार रहेगा, तब तक कवि गुरु के साथ साथ रामसिंह ठकुरी को भी याद
किया जाएगा।
सन १९४१ की बात है। भारत में तब ब्रिटिश शासन तीव्र रूप में चल रहा था। वे तब रावलपिंडी में थे। अचानक उनको द्वितीय विश्वयुद्ध के लिए बुलाया गया और वे अपने बैण्ड पार्टी और २/१ गोर्खा राइफल्स के साथ मलाया के लिए प्रस्थान हुए। मलाया और सिंगापुर लड़ाईं में पराजय के बाद मित्र सेना के कई सैनिक जापानियों के हाथों आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर हो गए थे। युद्ध बन्दी के तौर पर सेना के साथ रामसिंह ठकुरी को भी काफी कष्ट सहना पड़ा। लेकिन वे थे एक संगीत प्रेमी। इसलिए जहाँ भी जाते गीत-संगीत की चर्चा करते और अपने गमों को भुला देते थे। उनका यह संगीत प्रेम देखकर एक जापानीऑफिसर दिल से आकर्षित हुए और उन्होंने रामसिंह के लिए संगीत चर्चा करने एवं गीत-संगीत की प्रस्तुति के लिए विशेष सुविधा प्रदान करने की व्यवस्था कर दी।
कुछ दिनों बाद जापानी सेना उनको
नेताजी सुभाष चन्द्र के पास लेकर जाते हैं। सुभाषचन्द्र बोस ने रामसिंह ठकुरी को
अच्छे से परखा और उनको पता चल गया कि ये भी एक सच्चे देशभक्त हैं और ये इनके अंदर
भी अपने देशको अंग्रेजों की चंगुल से बचाने की आग है, तो झट से उन्हें 'आजाद हिंद फौज' में भर्ती कर लिया
गया। सुभाष चन्द्र बोस का सान्निध्य पाकर रामसिंह का मनोबल और भी दृढ़ हो गया और
संगीत साधना को भी आगे बढ़ाते गए। सन १९४३ में अर्थात् नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के
सिंगापुर भ्रमण काल में रामसिंह ठकुरी ने नेताजी को अपने एक स्वागत गीत द्वारा
स्वागत करके अपनी प्रतिभा का परिचय दिया था। वह गीत इस प्रकार था-
"सुभाष जी सुभाष जी वो जाने हिंद आ गए
है नाज जिसपे हिंदको वो जाने हिंद आ
गए..."
इस तरह धीरे-धीरे उनकी पदोन्नति होने लगी। सांगीतिक क्षेत्र में विशेष पारदर्शी होने के कारण उनको आजाद हिंद बैण्ड पार्टी केमुखियाके साथ-साथ कप्तान पद में पदोन्नत कर दिया गया। फिर नवक्रान्ति की सूचना हुई। सुभाष चन्द्र के कहने पर उन्होंने परेड गीत "कदम कदम बढ़ाए जा खुशी का गीत गाए जा" तैयार करके उसको संगीत से सजाकर प्रस्तुत किया। आज हम सभी भारतवासी उनके साथ-साथ उनकी कला को लेकर गौरवान्वित हैं। देशभक्ति गीत सबके दिलको छू लेता है और मन में देशप्रेम जगाता है।
सन् १९४३ अक्तूबर
१५ के दिन नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के व्यक्तिगत सचिव आविद हुसैन उनके साथ-साथ
उनकी कला को लेकर नेताजी का एक विशेष संवाद लेकर आते हैं। जहाँ नेताजी ने रामसिंह
को २१ अक्तूबर आजाद हिंद अंतरिम सरकार के स्थापना दिवस के दिन गाने के निमित्त कवि
गुरु रवीन्द्र नाथ टैगोर द्वारा विरचित राष्ट्रगीत "जन-गण-मन" हिंदी में
अनुवाद कर संगीतबद्ध करने के लिए आग्रह किया। इसका उल्लेख भी किया गया कि उस गीत
को आजाद हिंद सरकार का राष्ट्रगीत माना जाएगा।यह सुनकर रामसिंह ठकुरी का तन-मन
खुशी से झूम उठा था। नेताजी का आदेश मिलते ही आविद हुसैन और अन्य एक देशभक्त
गुप्ताजी केसहयोग से "जन-गण-मन" राष्ट्रगीत का तुरंत हिंदी में रूपान्तर
करके सुभाष चन्द्र बोस को सुनाया। सुभाष चन्द्र बोस यह गीत सुनकर इतना खुश हुए कि
उन्होंने अपनी खुशी का इजहार करते हुए रामसिंह ठकुरी को एक वायोलिन उपहार दिया।
सन् १९४३ अक्तूबर
२१ तारिख को अस्थायी रूप से आजाद हिंद सरकार का गठन हुआ। अस्थायी आजाद हिंद सरकार
के अधिकारीवर्ग के शपथ ग्रहण से पहले राष्ट्रीय ध्वजारोहण के क्षण रामसिंह ठकुरी
द्वारा संगीतबद्ध किया गया राष्ट्र गीत इसप्रकार गाया गया---
"सब सुख चैन की बर्खा बरसे
भारत भाग्य है जागा
पंजाब सिंधु गुजरात मराठा
द्राविड़ उत्कल बंग....। "
नेताजी ने सन् १९४३ अक्तूबर २५ को ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी थी। उस समय आजाद हिंद बटालियन की सेना अराकान, मणिपुर और कोहिमा तक आ पहुँची थी। पर वहाँ उन सबको हार का सामना भी करना पडा था। ज्यादातर सेना युद्ध बन्दी होकर रह गए। रामसिंह ठकुरी को भी युद्ध बन्दी बनाकर कोलकाता ले जाया गया। कोलकाता के युद्ध बन्दी शिविर में कुछ समय व्यतीत करने के बाद उन्हें दिल्ली के लालकिला बन्दी गृह में रखा गया। ब्रिटिश सरकार द्वारा तोड़फोड़ करने के आरोप में उनको कड़ी सजा दी। अपार धैर्य के साथ वे हर सजा हँसते-हँसते सहते गए।
सन १९४६, अप्रैल महीने में
अदालत ने रामसिंह को निर्दोष घोषणा करते हुए रिहा कर दिया। रिहा होने के बाद वे
अपने घर धर्मशाला को प्रस्थान हुए। लेकिन साथ ही साथ उनको आजाद हिंद फौज द्वारा
दिल्ली बुलवाया गया। तभी उनका सुभाष चन्द्र बोस के बडे भाइ शरद चन्द्र बोस से
मुकाकात हुई। दिल्ली में रहते समय राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी, पण्डित जवाहरलाल
नेहरू जैसे महान पुरुषों से उनकी भेंट हुई और उनके साथ रहकर काम किया था। रामसिंह
ठकुरी ने देश के लिए जो त्याग-बलिदान दिया, बन्दी जीवन से रिहा होने के एक वर्ष
के अंदर ही उनको फल भोगने को मिला। अर्थात् सन् १९४७, १५ अगस्त के दिन
भारत को पूर्ण रूप से स्वतंत्रता मिल गई। जिस सपने लेकर रामसिंह ने आजाद हिंद फौज
में शामिल हो गए थे, उसे पूरा होते देख वे
अत्यन्त हर्षित हो उठे। बाद में पं. जवाहरलाल नेहरू की इच्छानुसार रामसिंह ठकुरी
ने आई एन ए अर्केस्ट्रा गठन कर देश के विभिन्न जगहों पर देशभक्ति गीत संगीत कार्यम
का आयोजन किया। भारत के प्रथम स्वतंत्रता दिवस समारोह दिल्ली लालकिले में तत्कालीन
प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू द्वारा राष्ट्र को सम्बोधित करते वक्त कप्तान
रामसिंह ठकुरी के नेतृत्व में आजाद हिंद फौज के अर्केस्ट्रा बैण्ड ने अपना
राष्ट्रगीत "सब सुख चैन की बर्खा बरसे" प्रस्तुत किया था। बाद में सन् १९४६ में रामसिंह ठकुरी
उत्तर प्रदेश लखनऊ के पि एच सि बैण्ड में उप-निर्देशक के तहत नियुक्त होकर बैण्ड
मास्टर बन गए। उसी बैण्ड से ही डि.एस.पि के मानक पदक सहित ३०जून सन् १९७४ तारिख को वे अवकाश
ग्रहण करते हैं। सन् १९७४, जुलाई महीने से उनको 'आजीवन पुलिस कप्तान' का सम्मान प्रदान
किया गया। तब से सभी भारतीय उन्हें 'कप्तान रामसिंह ठकुरी' के नाम से जानते
हैं।
कप्तान रामसिंह
ठकुरी के निस्वार्थ देशप्रेम,
त्याग, धैर्य और सेवाभाव का सम्मान करते हुए
भारत सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार ने सन् १९७२ के १५ अगस्त के दिन ठकुरी को
स्वतंत्रता सेनानी सम्मान पेंसन प्रदान किया ।
प्राप्त पुरस्कार और सम्मान:-
क) किंग जॉर्ज पदक, सन् १९३७ ।
ख) नेताजी स्वर्ण पदक, सन् १९४३ ।
ग) उत्तर प्रदेश प्रथम राज्यपाल
स्वर्ण पदक, सन् १९५३ ।
घ) राष्ट्रपति पुलिस पदक, सन् १९७२ ।
ङ) उत्तर प्रदेश संगीत नाटक एकाडेमी
पुरस्कार, सन् १९७९ ।
च) सिक्किम सरकार द्वारा प्रथम
मित्रसेन पुरस्कार, सन् १९९३ ।
छ) पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा प्रथम आजाद हिंद पुरस्कार, सन् १९९६ ।
निष्कर्ष
भारत को स्वतंत्र बनाने हेतु भारतीय गोर्खाओं ने सर्वोच्च त्याग और बलिदान दिया है। यह क्रम आज भी जारी है। इन वीरों की त्याग-तपस्या के प्रतिदान स्वरूप उन्हें जो मान-सम्मान मिलना चाहिए था, वह अब तक मिला नहीं है। रामसिंह ठकुरी जैसे महान पुरुष के बारे में विद्यालय, महाविद्यालय के छात्र-छात्राओं की किताबों में एक पाठ होना अत्यन्त जरूरी है। उनके बारे में भारतीय जनता को जितना जाननाचाहिए था, लोग उतना नहीं जानते। ये हमारे लिए दुर्भाग्य की बात है। असम तथा भारत के जातीय संगठन जैसे गोर्खा छात्र संस्था, असम गोर्खा सम्मेलन तथा भारतीय गोर्खा परिसंघ,असम साहित्य सभा आदि संगठनों के पदाधिकारियों को इसबारे में संज्ञान लेकर थोड़ी गम्भीरता से काम लेना चाहिए और सरकार के समक्ष माँग रखनी चाहिए ताकि उन सब देशभक्तों को न्याय और उचित सम्मान मिल सके।
1.वीर जातिको अमर कहानी-एम.पि . राई।
2.गोर्खा ज्योति-मुख्य सम्पादक - भीम महाराजी, सम्पादक- हिमाल पाण्डे
3.https://en.m.wikipedia.org/wiki/Ram_Singh_Thakuri
4.https://thedarjeelingchronicle.com/special-article-capt-ram-singh-thakuri/


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