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हिंदी नवजागरण का विकास


जागरण : इसके मूल में मनुष्य की ‘विवेकवान बुद्धि’ निहित होती है यह किसी भी समाज अथवा राष्ट्र के सम्पूर्ण जीवनक्रम में अवश्य घटित होता है जिसके कारण हम अपनी परम्पराओं का मंथन और उसका मूल्यांकन करने को बाध्य होते हैं

हिंदी के राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्तजी के शब्दों में :

“हम कौन थे, क्या हो गए, और क्या होंगे अभी

आओ विचारें आज मिलकर,ये समस्याएँ सभी

नवजागरण : जब हम वर्त्तमान की दहलीज पर खड़े होकर अतीत की परम्पराओं का मंथन अपने भविष्य को दृष्टिगत रखते हुए करते हैं तो इसी को नए सिरे से जागरण (नवजागरण) अथवा फिर से जागृत होना (पुनर्जागरण) कहा जाता है यह फ्रेंच शब्द ‘रिनासांस’ तथा अंग्रेजी शब्द ‘रिनेसां’ का समानार्थी है

फ़्रांसिसी विद्वान दिदेरो ने ‘रिनेसां शब्द का प्रयोग उस नवीन साहित्य और कला के लिए किया, जो नवीन युग में दिखलाई दिया लेकिन इसका प्रभाव सामाजिक,राष्ट्रीय जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में परिलक्षित होता है यानि जब यह घटित होता है तो श्रेष्ठ साहित्यकार, कलाकार, वैज्ञानिक, समाजसुधारक, उद्योगपति, कानूनवक्ता, प्रशासक, राजनेता जन्म लेते हैं

नवजागरण की प्रक्रिया प्रत्येक समाज राष्ट्र के जीवन में अवश्य घटित होती है अर्थात् गिरकर उठने की प्रकिया निरंतर जारी रहती है । यद्यपि इसके काल खंड (समय) एवं निमिन्ति (कारण) प्रत्येक राष्ट्र के जीवन में अलग अलग होते हैं । इसके उदाहरणस्वरुप 15-16वीं शताब्दी के यूरोपीय जागरण को लिया जाता है  जिसके मूल में 1453 ई. में पूर्वी रोमन साम्राज्य के केंद्र स्थल कुस्तुंतुनिया का आटोमन साम्राज्य (तुर्की) द्वारा पतन तथा 1543 ई. की ब्रहमाण्ड के सूर्य केन्द्रित होने की खोज/ जानकारी जिसे कोपरनिकस की क्रांति भी कहते हैं जिनके परिणामस्वरूप नए/आधुनिक यूरोप का विकास हुआ । उन्होंने अपनी प्राचीन परम्पराओं का नए सिरे से मंथन व मूल्यांकन करना शुरू किया।

यूरोपीय इतिहासकार जूल्स मिशिलेट के अनुसार जागरण की इस घटना के दो आयाम थे –

1.      मनुष्य की खोज – इसने यूरोप की मध्ययुगीन धार्मिक परम्पराओं को तर्कपूर्ण चिंतन से युक्त किया, प्रयोगात्मक खोज-प्रणाली को जन्म दिया तथा मानववाद एवं मानवतावादी विचारों कोप्रश्रय दिया

2.      दुनिया की खोज – यूरोप में वैज्ञानिक आविष्कारों के तहत औद्योगीकरण व जहाजरानी का विकास हुआ कोलम्बस के द्वारा नई दुनिया यानी अमरीका की खोज तथा वास्कोडीगामा का कालीकट(भारत) पहुँचना इसी का परिणाम था

भारतीय सन्दर्भ में नवजागरण की प्रक्रिया 19वीं शताब्दी के प्रारंभ से घटित मानी जाती है, जिसे गुरुवर रामस्वरूप चतुर्वेदी जी ने ‘दो जातीय संस्कृतियों की टकराहट से उत्पन्न रचनात्मक उर्जा कहा है।‘ दरअसल 23जून 1757 ई. के ‘प्लासी युद्ध के बाद अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी का बंगाल में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप शुरू हुआ। अतः वहीँ पर भारत में सर्वप्रथम नई यूरोपीय वैज्ञानिक संस्कृति और मध्यकालीन भारतीय धार्मिक संस्कृति की टकराहट से जागरण की भावना पैदा हुई ।विदित हो कि बंगाल का जागरण प्रबुद्धजन का जागरण था, जिसके अग्रदूत राजा राममोहन तथा ईश्वरचंद्र विद्यासागर थे। उन्होंने सती प्रथा, विधवा विवाह, स्त्री शिक्षा जैसी उच्च वर्ग की सामाजिक समस्याओं को सुधारने का कार्य किया ।

अंग्रेजों की भारतीय क्षेत्रों पर विजय के साथ भारत में जागरण की प्रक्रिया का विस्तार हुआ। 19वीं शताब्दी के मध्य तक यह महाराष्ट्र में घटित हुई। लेकिन महाराष्ट्र का जागरण दलित वर्ग का जागरण था, जिसके पुरोधा ज्योतिबा फुले तथा उनकी पत्नी सावित्री बाईफुले थे। अतः महाराष्ट्र के जागरण में सामाजिक समस्याएँ भी दलित वर्ग से ही सम्बंधित रहीं । महाराष्ट्र से यह जागरण की प्रक्रिया गुजरात पहुँची, जिसका नेतृत्व स्वामी दयानंद सरस्वतीजी ने किया।

हिंदी नवजागरण – 19वीं शताब्दी के मध्य के बाद भारतेंदु हरिश्चंद्र के उदय के साथ हिंदी में नए युग का आरंभ हुआ । यह मान्यता तो आचार्य रामचंद्र शुक्ल के समय से प्रचलित थी किन्तु इस नए युग को ‘नवजागरण नाम देने का श्रेय डॉ. रामविलास शर्मा को है। उन्होंने ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण (1977 ई.) नामक पुस्तक के द्वारा हिंदी नवजागरण की संकल्पना प्रस्तुत की। इसके पहले नवजागरण की चर्चा प्रायः बांग्ला नव जागरण के रूप में होती थी। ‘भारतेंदु हरिश्चंद्र और हिंदी नव जागरण की समस्याएँ’ (1984) की भूमिका में उन्होंने लिखा “नवजागरण यह शब्दबंध नया था, धारणा पुराणी थी” जबकि डॉ. लक्ष्मीसागर ने इसे ‘नवोत्थान तथा रामधारी सिंह ‘दिनकर ने ‘पुनरुत्थान नाम दिया।

हिंदी साहित्य में नवजागरण की शुरुआत भारतेंदु हरिश्चंद्र व उनके मंडल के लेखकों के माध्यम से होती है। इसके पहले बांग्ला साहित्य में दीनबंधु मित्र लिखित ‘नीलदर्पण
(1860 ई.) एवं माइकेल मधुसूदन दत्त लिखित ‘मेघनाध वध’ (1816 ई.) की चर्चा होती थी।‘ऊपर से यह विरोधाभास जरुर लगता है लेकिन हर जागरण की पृष्ठभूमि रुदन की होती है।भारतेंदु हरिश्चंद्र ने देशवासियों को संबोधित करते हुए ‘भारत दुर्दशा
नाटक में लिखा-

‘आवहु सब मिलिकै रोवहु भारत भाई।

हा हा भारत दुर्दशा न देखी जाई।।‘

इस रुदन से उत्पन्न करुणा का सीधा संबंध देश के तत्कालीन यथार्थ जीवन से है। देश की दुर्दशा का मुख्य कारण विदेशी  शासन के तहत भारत की आर्थिक लूट है। इसलिए भारतेंदु अंग्रेजी राज्य के आर्थिक शोषण का पर्दाफास करते हैं –

‘भीतर-भीतर सब रस चूसै

हँसि-हँसि के तन-मन-धन मूसै।

जाहिर बातन में अति तेज,

क्यों सखि साजन नहिं अंग्रेज ।।“

साथ ही धन के विदेश चले जाने पर चिंता भी  व्यक्त करते हैं –

‘अँगरेज राज सुख साज सजै सब भारी

 पै धन विदेश चली जात इहै अति ख्वारी।‘

‘अंधेर नगरी नाटक में चूरन वाले के माध्यम से अत्यधिक टैक्स पर व्यंग्य भी करते हैं- ‘चूरन हाकिम लोग जो खाते।सब पर दूना टैक्स लगाते’।अँगरेजी राज की इस शोषणकारी नीति के कारण भारत में अकाल एवं महामारी का प्रकोप लगातार बढ़ रहा है।  राधाकृष्णदास के शब्दों में –

“कौन नाज का कहै ठिकाना, कौन घास और चारे का।

जल का टोटा प्राण बचे क्यों, जल बिन हाय विचारे का।।“

इसी कारण ‘भारत दुर्दशा नाटक में भारतेंदु ने अंग्रेजी राज्य को ‘भारत दुर्देव कहा तथा  इसका समाधान स्वदेशी व स्थानीय उद्योग धंधों के विकास में खोजा । 23 मार्च 1874 ई. की ‘कवि-वचन-सुधा में स्वदेशी का प्रतिज्ञा पत्र – ‘हम भारत के लोग................लगावेंगे’ छापा जिसे रामविलास शर्मा ने भारतेंदु का बहुत ही साहसिक कदम माना’ । भारतेंदु ने अपने बलिया वाले व्याख्यान – ‘भारतोन्नती कैसे हो?’ (1877ई.) में भी इसका विस्तृत वर्णन किया ।

हिंदी नवजागरण के विकास का अगला कदम धार्मिक व सामाजिक सुधार था। रामविलास शर्मा ने इसे भारतेंदु मंडल के लेखकों का कर्तव्य माना । क्योंकि हिंदी नवजागरण में राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर व महात्मा ज्योतिबा फुले जैसे समाज सुधारक नहीं जुड़ पाए । अतः यह कार्य लेखकों को ही करना पड़ा ।भारतेंदु ने धर्म में सुधार की आवश्यकता पर जोर देते हुए लिखा -

 ‘हमारा धर्म ऐसा निर्बल व पतला हो गया कि केवल स्पर्श से या एक चुलार पानी से भर जाता है’

प. बालकृष्ण भट्ट ने समाज की प्रचलित रूढ़ियों पर प्रहार किया -

‘जिसमें सात वर्ष की कन्या व्याही जाय जिसमें आठ कनौजिया नौ चूल्हे हो........ जिसमें एक जाति का छुआ भोजन कर लेने से पतित हो जाय, वह सनातन धर्म क्या विचारवान लोगों के पोषण योग्य है?

पंडित प्रतापनारायण मिश्र ने हिन्दू और मुसलमानों को भारतमाता के दो हाथ माना । जबकि प्रेमघन ने दोनों के मध्य परस्पर एकता व प्रेम का आह्वान किया।

 भारतेंदु ने 15 मई 1879 ई. की कविवचनसुधा पत्रिका में ‘जातीय संगीत’ के नाम से एक विज्ञापन प्रकाशित किया जिसमें बाल--विवाह से हानि, जन्मपत्री मिलाने की अशास्त्रता, बालकों की शिक्षा, अंग्रेजी फैशन से शराब की आदत, कन्या की भ्रूणहत्या, फूट और बैर, स्वदेशी आदि विषयों में लोकशैली पर आधारित रचनाएँ लिखने को प्रेरित किया

उन्होंने विदेश यात्रा का समर्थन करते हुए लिखा –

‘रोकि विलायत गमन कूप मंडूक बनायो ‘ अर्थात् हमें अपने बालकों को इंग्लैंड जाने से रोककर उन्हें कुए का मेढ़क नहीं बनाना चाहिए

प्रेमघन ने अनमेल विवाह तथा बाल-

विवाह की निंदा करते हुए कहा

‘असी बरिस के भय बूढ़ तू, जैस हमारा परपाजा रामा

हरि हरि हम बारहै बरिस के, अब ही बाला हे हरि ।।

भारतेंदु के शब्दों में भारतीय नवजागरण की मूल समस्या  ‘स्वत्व निज भारत गहै’ थी यह स्वत्व वही था, जिसे आजकल अस्मिता बोध कहते हैं लेकिन राजनीतिक स्वतंत्रता का मार्ग उस समय अवरुद्ध जानकर सामाजिक सांस्कृतिक मोर्चों पर देशवासियों को जागरूक करने का काम साहित्यकारों ने किया

भारतेंदु ‘निजभाषा की उन्नति के पक्षधर थे उन्होंने प्रयाग के ‘हिंदी वर्तनी सभा के अधिवेशन में व्याख्यान दिया-

‘करहूँ बिलम्ब न भ्रात अब, उठहू मिटावहू सूल

निजभाषा उन्नति करहूँ, प्रथम जो सबको मूल

बलिया के व्याख्यान में उन्होंने कहा –‘परदेशी वस्तु और परदेशी भाषा का भरोसा मत करो अपने देश में अपनी भाषा की उन्नति करो।‘ 1877 ई. में बलिया में ‘भारतोंनती कैसे हो?’ नाम सेदिया गया व्याख्यान उनकी राष्ट्रीय जागरण की अवधारणा को पूर्णतः स्पष्ट कर देता है जिसमें उन्होंने मात्र हिंदी भाषी क्षेत्र के जागरण की बात न कहकर सम्पूर्ण राष्ट्र-देशवासियों के जागरण की बात की है । अतः हिंदी नवजागरण का विकास प्रारंभ से ही राष्ट्रीय रहा है ।

 

 

 

निष्कर्षतः हिंदी नवजागरण के विकास के प्रमुख बिन्दुओं को रेखांकित किया जा सकता है-

1.       हिंदी नवजागरण का नेतृत्व समाज सुधारकों ने नहीं बल्कि साहित्यकारों ने किया जिसके नेता भारतेंदु हरिश्चंद्र थे । उन्होंने अपने मंडल के लेखकों के साथ इसे आगे बढ़ाया।

2.       हिंदी भाषा का क्षेत्र विशाल है अतः साहित्यकारों का दृष्टिकोण अखिल भारतीय रहा भारतेंदु ने ‘भारत दुर्दशा नाटक में तैतीस करोड़ भारतवासियों की चिंता व्यक्त की है

3.   हिंदी नवजागरण बंगाल के नवजागरण की तरह अंग्रेजी व अंग्रेजी भाषा के प्रति मोहग्रस्त नहीं रहा इसलिए देश के दुर्दशा का हल अंग्रेजों की कृपा के बजाय पूर्ण-स्वाधीनता में देखा गया

4.       हिंदी क्षेत्र का अधिकांश हिस्सा अंग्रेजों के प्रत्यक्ष अधीन न रहकर स्थानीय/रियासती राजाओं के अधीन रहा।जिससे जागरण का प्रभाव समुचित रूप से न फैलने के कारण हिंदी क्षेत्र के जागरण में धर्म व भाषा को लेकर मतभेद पैदा हुएवहाँ पर हिन्दू-मुस्लिम तथा हिंदी-उर्दू को लेकर विवाद पैदा किए गए इससे जागरण का प्रभाव समाज पर विपरीत पड़ा

5.       हैरानी की बात यह है की हिंदी प्रदेशों का नवजागरण धर्म, इतिहास व भाषा को लेकर विभाजित हुआ। अर्थात् धर्म के आधार पर  हिन्दू व मुस्लिम का विभाजन, इतिहास के आधार पर प्राचीन काल तथा मध्यकाल का विभाजन और भाषा के आधार पर हिंदी तथा उर्दू भाषा का विभाजन हुआजिसके कारण लोग आपस में बटे एवं जागरण की उर्जा का ह्रास हुआयह एक बड़ी बाधा थी जिसके दुष्परिणाम वर्त्तमान समय में भी देखने को मिल रहे हैं

 

 

सहायक ग्रंथ

क.    हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहबाद

ख.    बांग्ला साहित्य का इतिहास,सुकुमार सेन, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली

ग.     आलोचना, संपादक – नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली

घ.     भारत दुर्दशा, भारतेंदु हरिश्चंद्र, नई दिल्ली, समाज शिक्षा प्रकाशन, नई दिल्ली


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