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मणिपुरी नाटक ‘श्रीतोम्बा अमसुङ कै’ और हम : थोकचोम मोनिका देवी


‘श्रीतोम्बा अमसुंङ कै’ मणिपुर के प्रख्यात नाटककार खुन्द्राकपम ब्रजचांद का चर्चित नाटक संग्रह है| हालांकि उन्होंने ज्यादा नाटक नहीं लिखें हैं लेकिन मणिपुरी नाटक साहित्य के क्षेत्र में उनके यही कुछ गिने-चुने नाटक अपना विशेष स्थान रखते हैं। नाटक की परंपरागत शैली से हटकर उन्होंने एब्सर्ड या असंगत नाटकों की रचना में प्रयोगात्मक शैली को अपनाया है। अपने अल्प जीवन काल में जिन कृतियों को उन्होंने रचा है उन्हें देखकर लगता है जैसे उन्होंने जीवन के प्रत्येक पक्ष को बहुत बारीकी से अत्यंत नग्न रूप में देखा एवं परखा है। हास्य प्रधान शैली में उनका प्रत्येक पात्र पहले पाठक को हँसाता है, हाथ पकड़कर हर उस गली से घुमाता है जहाँ से हर साधारण व्यक्ति कभी न कभी गुजरा होता है। जिसका  व्यक्ति भुक्तभुगा होता है और उस गली के अंत तक आते-आते उनके यही पात्र हमें जीवन के उस सत्य से अवगत कराता है जिससे भविष्य में हमारा सामना होगा। उनके नाटक के पात्र जहाँ एक ओर हास्यात्मक शैली द्वारा यथार्थ को प्रस्तुत करते हैं वहीं ऐसा प्रतीत होता है कि वे भ्रष्ट सत्ताधारियों के गालों पर शब्दों का करारा तमाचा जड़ रहे हो।

‘श्रीतोम्बा अमसुं कै’ नाटक की शुरुआत में दिखाते हैं कि शराब से ग्रस्त तोम्बा आत्महत्या करने जा रहा है। उसके शब्दों से पता चल रहा है कि वो मरने तो जा रहा है लेकिन चाहता है कि कोई न कोई वहाँ आ जाए और उसे मरने से रोक ले। वह इसी ज़द्दोज़हद में होता है और इसी बीच कई सारी घटनाएँ घटती हैं। एक ओर एक वृद्ध तोम्बा से पैसे माँगता है जिसे उसने उधार लिए थे तो दूसरी ओर एक युवक तोम्बा के कहने पर उसके मरने के कार्यक्रम का आनंद प्रत्यक्ष रूप से लेने के लिए लोगों को टिकट बेचने लगता है। सबको अपने-अपने पैसे की पड़ी है ।कोई भी तोम्बा को नहीं रोकता। तभी वहाँ से एक कै यानि बाघ गुजरता है।वह तोम्बा से मरने का कारण पूछता है। उसे पता चलता है कि तोम्बा पैसों की तंगी के कारण मरने जा रहा है। बाघ की बातों से पता चलता है कि वह शुरू से हीतोम्बा की बातें सुन रहा था और इसलिए वहाँ आया था क्योंकि तोम्बा ने कहा था कि वो आदमी है। बाघ उससे पूछता है कि वह उन पैसों का क्या करेगा, तब तोम्बा बताता है कि पैसों से कई सारे कार्य किए जा सकते है।जैसे गरीबी हटाना या उसके गली का ख़राब बल्ब बदलना। अंत में बाघ तोम्बा को १०० रुपए देता है| दोनों के बीच दलील लिखी जाती है। दलील में लिखा जाता है कि बाघ तोम्बा को एक महीने के लिए १०० रुपए उधार दे रहा है और ठीक एक महीने के बाद उसे ब्याज सहित लौटाना है |

नाटक के दूसरे अंक में पता चलता है कि तोम्बा बहुत अमीर बन गया है। वह इतना अमीर बन गया है कि पापड़ रखने के बरतन भी सोने का बनाता है। अपने मोहल्ले में वह मशहूर हो गया है। लोग उसे समारोहों में विशिष्ट अतिथि के रूप में बुलाने लगे हैं। वह राजाओं की तरह अपनी भी यश गाथा लिखवाता है जो सब असत्य है ।अनन्तर वह बाघ को मारने की योजना बनाता है लेकिन वह असफल होता है। बाघ निश्चित दिन  वापस आता है। वह बताता है कि कभी कक्षा आठ के उसके इतिहास के अध्यापक ने बताया था कि बाघ आदमी खाता है। तब से वह हजारो साल भूखे आदमी की खोज कर रहा है। उसने तोम्बा को भी इसलिए पैसे दिए थे क्योंकि उसने बताया था कि वह आदमी है। वह तोम्बा से पूछता है जिन चीजों को करने का वादा किया था, क्या उसने वो सब पूरा कर लिया है। तोम्बा बताता है कि उसने बहुत कुछ तो कर लिया है लेकिन वो अपनी गली का बल्ब बदलना भूल गया है। इसे सुनकर बाघ निराश हो जाता है कि तोम्बा ने उसे धोखा दिया है। वो उसे नहीं खा सकता क्योंकि वो आदमी नहीं है। लेकिन तोम्बा खुद उसके पीछे पड़ जाता है और उसे खाने को कहता है। वह सफाई देता है कि उसने गली में बल्ब बदलने के अलावा कई अन्य बड़े काम किए है। लेकिन बाघ नहीं मानता और वह रोता रह जाता है कि वो आदमी है।

पूरा नाटक मनुष्य की मनुष्यता पर बड़ा प्रश्न चिन्ह लगाता है। नाटक आरंभ से ही आज के समाज में रहने वाले लोगों की स्वार्थपूर्ण प्रवृत्ति और ‘मैं’ की भावना को उजागर करता है। आज व्यक्ति अपने स्वार्थ में कैसे लिप्त रहता है इसे स्पष्ट करने के लिए नाटक में दिखाते है कि चाहे तोम्बा आत्महत्या ही क्यों न कर रहा हो, लोगों को अपने पैसे से ही मतलब है। उन्हें अपने पैसे वापस चाहिए। जहाँ एक ओर तोम्बा के मुहल्ले वाले अपने बच्चों को डाँटते समय या नसीहत देते समय तोम्बा का नाम मिसाल के तौर पर लेते हैं। वे ही तोम्बा को आत्महत्या करने से रोकने के बजाय टिकट बेचकर उसे मनोरंजन का साधन बना देते हैं।

तोम्बा जब अमीर बन जाता है, तब ये लोग ही उसकी प्रशंसा करने से नहीं थकते। उसके बारे में कई मन गढ़न बातें लिखी जाती है। लोग उसे मस्का लगाने लगते हैं और अपना स्वार्थ पूरा करने लगते हैं। तोम्बा को खम्बा के जितना बलशाली बताया जाने लगता है। उसके बारे में इतिहास तक लिखा जाता है, जिसमें बताया जाता है कि जिस दिन से उसने सत्ता संभाला है, ठीक उसके अगले दिन से तोम्बा ने लोगों के लिए समर्पित हो गया है। यहाँ तक कि उसी ने लोकताक झील को खोदा है एवं वहाँ से निकाले गए मिट्टी के ढेर से कौब्रू पहाड़ खड़ा किया है। नाटक के इस अंक में लेखक ने सत्ताधारियों के झूठे कार्यकलापों का पर्दाफाश किया है।उन्होंने आज के सत्ताधारियों के रंग बिरंगे इतिहास के पीछे की सच्चाई को सबके सामने खोलकर रख दिया है।

मनुष्य जाति को जैविक वर्ग में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, पशु वर्ग से उसे अलग करने के पीछे सबसे बड़ा कारण उसकी बौद्धिक क्षमता और सामाजिक प्रवृत्ति को कहा जा सकता है, जिसके कारण वे एक दूसरे के साथ मिलकर रहते हैं एवं सुख-दुःख में एक दूसरे की मदद करते हैं। पशु में यह विशेषता नहीं होती। पशुओं में सामाजिक मानसिकता तो होती है पर उसका एक अलग स्वरूप है। उनमें परिवार या एक दूसरे के प्रति अपनेपन का भाव या सहयोग की भावना प्रायः नहीं होती| जिस प्रवृत्ति के लिए मनुष्य अपने आप को अन्य वर्ग से सर्वश्रेष्ठ मानता है, उसे नाटककार बाघ के माध्यम से संशोधित करने को कहता है। बाघ तोम्बा को इसलिए पैसे देता है क्योंकि तोम्बा कहता है कि वह आदमी है और अगर उसको पैसे मिलेंगे तो वह लोगों के लिए अच्छा काम करेगा। बाघ कई साल आदमी की खोज करता है।अंत में जब वह तोम्बा को अपना वादा पूरा करने को कहता है तो पाता है कि तोम्बा ने कोई भी काम नहीं किया है। यहाँ तक कि अपने गली का बल्ब तक नहीं बदला। बाघ निराश होकर वापस चला जाता है। जो तोम्बा बाघ के द्वारा मारे जाने के डर से अपने लोगों को बाघ को मारने के लिए भेजा था, वही तोम्बा अंत में खुद बाघ को सफाई देता रह जाता है कि वह वाकई आदमी है और बाघ उसे मार सकता है,लेकिन बाघ उसे आदमी नहीं मानता और इस तरह नाटक का अंत होता है।सवाल यह है कि क्या हम भी तोम्बा नहीं बन गए हैं ? क्या आर्थिक दबाव के चलते व्यक्ति आत्महत्या के रास्ते को नहीं चुनता ? और अगर वह यह रास्ता नहीं चुनता तो जो वह काम करता है उससे क्या वह आदमी बना रह सकता है?  तोम्बा के साथ भी यही स्थिति है। समय जब तोम्बा को मौका देता है तो लोगों के लिए बड़े काम करना तो दूर, वह अपने आरामदायी जीवन में मग्न हो जाता है । अपनी गली के बल्ब तक को बदलना भूल जाता है। जिस पशु वर्ग से ऊपर होने का दर्जा खुद मनुष्य देता है, उससे वह कोसों दूर हो जाता है और एक पशु ही उसे मनुष्य मानने से इंकार कर देता है। यही आज व्यक्ति की विडम्बना है।       


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2 टिप्‍पणियां:

  1. इस आलेख के माध्यम से कुछ नवीन तथ्यों को पढ़ने का अवसर मिला है। इसके लिए आपको हार्दिक बधाई।

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