ट्रैफिक जाम
अभी दस दिन हुए ही थे कि ईटानगर वासियों में
हो-हल्ला मचना, छाती और सिर पीटना शुरू कर दिया। पहले से ही अव्यवस्थित ट्रैफिक से
आम जनता ‘जाम’ की नियमित मार से पीढ़ित थी। इस मरम्मत के कार्य ने इस समस्या को एक
विकराल दैत्य का रूप दे दिया जो सबको निगल लेना चाहता था। डिविजन-IV, आबोतानी कॉलोनी, नीति विहार, एफ़ सेक्टर,
दूरदर्शन कॉलोनी, पांचाली, राजभवन आदि बाई-पास रोड भी डायवर्जन के कारण जाम की
चपेट से आजाद न था। ये सारे रक्षक भी भक्षक बन बैठे थे। ऐसा लगने लगा था मानो जंगल
में स्वच्छन्द विचरते पशुओं को किसी घेरे में कैद कर लिया हो। चार चक्के वाले
अपने-अपने गन्तव्यों तक पहुँचने के लिए दो घण्टे पहले घर से निकलने को बाध्य होने
लगे। ऑफिस जाने और ऑफिस से लौटते वक्त मानो दुनिया बीच सड़क में थम सी जाती। अचानक
स्कूटी और मोटर बाईक के प्रति लोगों का आकर्षण बढ़ने लगा।
किसी के संयम को परखना हो, तो ऐसे जाम में फँसे
लोगों के रवैया को देखना चाहिए। इस अस्त-व्यस्थता के लिए सरकार को दोषी ठहराते हुए
हर दो या तीन लोगों के ज़ुबान से गालियों का बरसना प्रतिदिन की घटना हो गई। फेसबुक
और व्हाट्स-एप्प जैसे कृत्रिम मंच सरकार के विरुद्ध तीखे आलोचनाओं से भरा मिलता-
“अच्छी-खासी सड़क थी;
अच्छी खासी ज़िन्दगी थी। सब बेड़ा गर्ग करके रख दिया।”
“इस सरकार से जनता की सुख
और चैन नहीं देखी जाती।”
“हमें इस धूल धूसरित जाम
और गर्मी में तपने को छोड़ आप तो एयरकण्डिशन गाड़ी और कमरों में आराम फरमाते हैं।”
“न जाने मरम्मत के बहाने
कितने सरकारी खज़ानों से अपनी तिजोरी भर ली होंगी।”
इस तरह की तयशुदा वचनों
से प्रतिदिन सरकार का महिमा मण्डन होता रहता।
समस्त ईटानगर परेशान था। चेहरे उखड़े हुए थे
सबके। लेकिन रोनू के चेहरे पर शिकन की एक रेखा तक नहीं रहती। बल्कि उनमें अजीब सा
सुकून और ठहराव सा तैरता रहता। जिस विकट घड़ी में फँसकर और लोगों का संयम तार तार
हो जाता, वहीं रोनू हल्की मुस्कान के साथ उस महासागर को पार कर जाती। जैसे उनके
लिए वह कोई समस्या न होकर एक सामान्य रूटीन हो।
रोनू चिम्पू में स्थित वन विभाग में क्लर्क है।
पिछले आठ वर्षों से वह अत्यन्त ईमानदारी और लगन से इस दफ्तर को सेवा देती आ रही
है। इन आठ वर्षों में एक भी मर्तबा ऐसा न हुआ कि किसी ने उसके विरुद्ध शिकायत का
एक भी लफ्ज़ कहा हो। न अफसरों ने, न उनके सहकर्मियों ने। उनका सहज स्वभाव एवं काम
के प्रति लगन ने सबके दिलों में उसे बिठाया। सिर्फ पेशे ही नहीं, पारिवारिक और
सामाजिक सरोकार भी वह सहजता से निभाती आई है। विवाह के पहले भी... विवाह के बाद
भी! ससुराल हो या मायका, सबकी दुलारी ही बनी रही। तीन बच्चों की माँ बनने के बाद
मिथूनगेट में अपना आशियाना बसाया। तब से उसे रोज़ाना मिथूनगेट से चिम्पू की यात्रा
तय करनी पड़ती। मिथूनगेट से चिम्पू यानी ईटानगर की उत्तरी छोर से दक्षिणी छोर तक। लगभग
पाँच किलो मीटर की इस दूरी को तय करते हुए रोनू रोज हर उस जगह से गुजरती जहाँ पर
जाम सबसे अधिक लगता है। जीरो पॉइन्ट, बैंक तीनाली, सेक्रेटेरियत, गंगा- इन जगहों से
गुजरने के लिए रोनू पहले सी ही अपने मन-मस्तिष्क को संयम के अनुशासन में बाँध
लेती। हाँ, कभी कभी वह झुंझलाती जरूर थी जब उसे ऑफिस से घर जल्दी पहुँचना होता था।
लेकिन वह तो जीवन के विकट से विकट परिस्थितियों में भी ढल जाने को अभ्यस्त थी। फिर
यह ट्रैफिक जाम किस खेत की मूली थी?
आज भी वह जाम में फंसकर बिल्कुल भी बेचैन न थी।
बल्कि विगत एक वर्ष से उन्हें यह जाम अच्छा ही लगने लगा था। उन्हें अब किसी बात की
जल्दी नही रहती थी। न जल्दी ऑफिस पहुँचने की चिन्ता न जल्दी घर लौटने की इच्छा। उसका
मन करता बस इसी जाम के संग थमकर रह जाए, महज पाँच किलोमीटर की यह यात्रा। जाम में
फँसे परेशान लोग और गाड़ियों के चिलम-पौं के बीच न जाने क्यों रोनू को सुकून का
अनुभव होता। शायद उनको यहाँ किसी के सामने कुछ प्रिटेन्ड नहीं करना पड़ता। वह जैसी
है वैसी ही अपनी गाड़ी के भीतर खुद के सामने पेश आती है। वह हँसना चाहे तो हँसती। रोना
चाहे तो रोती। पर ऑफिस और घर में उसे वह बनना पड़ता जो वह है नहीं। जो वह कतई बनना
नहीं चाहती। इसलिए कछुए की चाल में रेंगती गाड़ियों की कतार में शामिल वह एक-एक पल
का, एक-एक दृश्य का आनन्द उठाती हुई आगे बढ़ जाती। लेकिन इस आनन्द का कोई हेतु
नहीं। स्वयं को खुश रखने के वासते वह इन निराधार पल और दृश्यों का आनन्द उठाती है।
असल में वह कटाई और खुदाई के चलते उड़ते धूल कणों के साथ मन के भीतर उमड़ता बवंडर को
उड़ा देना चाहती है।
इन्हीं पलों में वह आत्मावलोकन करती रहती है कि
जीवन के किस मोड़ पर, कौन सी भूमिका निभाते उससे चूक हो गई जिसका यह फल मिला। वह
अतीत का हर एक पन्ना खंगाल कर पुन:-पुन: लौट आती, मगर ऐसा कोई प्रमाण हाथ नहीं आता
जिसके कारण स्वंय को उस अनहोनी के लिए दोषी ठहरा सके। उन्हें वे अज्ञात कारणों से
घटित घटनाएँ सिलसिलेवार तरीके से याद आती रहती जिसे वह एक बुरा सपना समझकर भुला
देना चाहती है। मगर उनके मानस के सबसे गहरे कोनों में वह अंकित हो चुका था जिसका
मिटना उसकी मृत्यु के बाद भी संभव न था।रोनू के लिए आज भी वह वजह एक रहस्य है
जिसके लिए मारदिन ने उस रास्ते पर चलने को ठान लिया।
अपने जीवन में रोनू बहुत खुश थी। बिन माँगे ही
ईश्वर ने मारदिन जैसा पति और तीन मासूम बच्चों से उनकी दुनिया सँवारा था।
हँसता-खेलता उनका परिवार अपनी बिरादरी में आदर्श परिवार का मिसाल बन गया था। जीवन
के इस सफर में रोनू की सन्तुष्टि का सबसे बड़ा कारण मित्र सरीके हमसफर का होना था। मारदिन
उनके लिए पति से बढ़कर मित्र था, जिनके साथ कोई भी सफर तय करना कितना आसान हो गया
था। ऐसा हमसफर, कि संसार की सारी दौलत भी निछावर कर जाने को जी चाहता। रोनू की
पड़ोसन श्रीमती मोयिर अक्सर उनके घर आया करती। जब भी आती मारदिन की प्रशंसा करती
नहीं थकती। खासकर जब उनकी सास और ननद घर आये तो मोयिर अच्छी छात्रा की तरह अपनी
उपस्थिति दर्ज करा ही देती। लेकिन ऐसी छात्रा जो दुनिया भर का ज्ञान बाँटकर जाती
है। किसके घर कैसा झगड़ा चल रहा है, किसकी पत्नी किसके साथ भाग गई, किसके घर कौन
आधी रात चोरों की तरह घुसता और निकलता है, किसका पति कितने स्त्रियों के साथ गुलछर्रे
उड़ा रहा है- ऐसी जानकारियों की मालिक बन वह उनकी सास और ननद की भी ज्ञान में
वृद्धि करती रहती। उनका सबसे प्रिय विषय रहता – पति। इस विषय पर तो वह घंटो भाषण
दे सकती। उस रोज ञ्योकुम पर्व की छुट्टी के अवसर पर रोनू ने अपनी मण्डली को दावत
पे बुलाया। श्रीमती मोयिर ऐसा पावन अवसर कैसे गवाती। वही चालू हो गई-
“मुझे तो इन पतियों पर
ज़रा सा भी विश्वास नहीं होता।”
“क्यों मोयिर बाईदो? ऐसा
क्या कर दिया आपके पति ने?” गुम्पी ने मोयिर की चुटकी लेते हुए उनके इस अविश्वास
का कारण पूछा। सबका ठहाका गूँजा।
“बहुत कुछ किया है! मुझे तो मर्द जात से ही
नफरत है। कुत्ता है! सबके सब कुत्ता है! हर जगह मुँह मारने वाला।”
मोयिर ने अन्न का बड़ा-बड़ा निवाला मुँह में लेते
हुए ऐसे चबाया जैसे उन कुत्तों को ही चबा डालना चाहती हो। दृश्य और लहजा
हास्यास्पद था। ठहाके की गूँज और प्रचण्ड होने लगी।
“यह बात तो सच है। इस मर्द जात पर पूरी तरह
विश्वास करना अपने आप को धोखे में रखना है। इनकी नीयत कब और कहाँ फिसल जाए, भगवान
भी न जान पाए! इसलिए अपनी आँखें उन पर से हटने नहीं देना चाहिए। ” मोयिर की बातों
से हामी भरती हुई आङा ने कहा।
इस
हास-परिहास में इन महिलाओं ने कितने पुरुषों की जन्म-पत्री सरेआम करके रख दी। रोनू
उन्हें खिलाने-पिलाने में मग्न, उनकी बातों को सुन बस मुस्कुराती रहती। अगर उनकी
मण्डली उनके बनाए व्यंजनों संग इन ‘पर्दा-फासी’ पर हँस रहे हैं तो यही सहीं। मगर
किसी के निजी जीवन पर दखलंदाजीकरना उनके स्वभाव के विपरीत था। ऐसी परिचर्चाओं में
वह मुक प्रतिभागी ही बनी रहती। पर यहाँ मोयिर ने जो विषय छेड़ा था, वह अब थमने का
नाम नहीं ले रहा था-
“पता है? वो यासा का पति ताचो...हाँ हाँ वो चार
बच्चों का बाप...जिसकी पहले से ही दूसरी पत्नी है! अब तीसरी शादी भी करने जा रहा
है?” गुम्पी ने एक नवीन अध्याय खोला। सबने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया-
“वही तो! कुत्तों की उपाधि इन्हें यूँ ही थोड़ी
न मिले है। एक पत्नी से वे कभी सन्तुष्ट हो ही नहीं सकते।” प्लेट की आखिरी निवाला
मुँह में डालते हुए यानाम ने आगे कहा- “और
मज़े की बात बताऊँ सबको?...इस बीवियों की संख्या बढ़ाने की दौड़ में हमारे तागिन और
ञ्यिशी लोग सबसे आगे हैं।”
“क्या? और समुदाय के मर्द लोग दूसरी-तीसरी शादी
नहीं करते?” मोयिर ने कौतुहल जाहिर करते हुए पूछा।
“करते है...ज़रूर करते है! लेकिन बस गिने चुने
लोग ही होंगे। हमारे तागिन और ञ्यिशी लोगों ने तो इस प्रथा को एक फैशन बना रखा है।
पूर्वजों की बात कुछ और थी। हमारे दादा परदादा या तो संतान उत्पत्ति के लिए बहु-विवाह करते थे या निराश्रित महिलाओं को समाज में
सुरक्षा प्रदान करने के लिए।पूर्वजों का युग तो बीत गया, लेकिन उस प्रथा को
परम्परा का हवाला देकर आज भी इन लोगों ने ज़िन्दा रखा है, क्यों?....ताकि ऐयाशी कर
सके और अपराध बोध भी न हो। क्योंकि उनकी माने तो उन्हें यह प्रथा विरासत में मिली है।”
प्लेट चट करते हुए यानाम ने अपनी बात खत्म की। गुम्पी ने वहीं से विषय को आगे बढ़ाया-
“अपनी हवस और ऐयाशी के पक्ष में ये मर्द जात
तर्क देते नहीं थकते कि हमारे आदि पुरुष आबो तानी के तो सौ-सौ बीवियाँ थी। हमारे
दादा-परदादाओं के जीवन तो दस-पन्द्रह पत्नियों से आबाद था। हम तो फिर भी सिर्फ़ दो
या तीन बीवियों के साथ गाँठ बाँधते हैं।”
“मेरा बस चले तो इन मर्दो के........!”मोयिर ने
अपनी हाथों से छुरी चलाने का अभिनय करते हुए कुछ कहना चाहा पर रोनू ने बीच में ही
टोकते हुए कहा-
“बस..बस मोयिरबाईदो! आगे कहने की ज़रूरत नहीं!
हम सब समझ गये!” सबकी हँसी छूटने लगी। हँसते-हँसते सबकी आँखे गीली हो गई। अभी-अभी
भोजन से भरे, सबके पेट में दर्द होने लगा।इस आँसू और दर्द का अपना मज़ा था।
रोनू की मण्डली जब भी मिलती, ऐसी गूढ़ ज्ञान का
आदान प्रदान होता रहता। रोनू खामोश रहकर अपनी मण्डली के सदस्यों की
क्रिया-प्रतिक्रियाओं का आकलन करती रहती। रोनू को उन लोगों पर तरस आता। बेचारी उनकी
मण्डली की अधिकतर महिलाएँ किसी-न किसी रूप में बहु-विवाह की मार से पीड़ित हैं।
उनके बीच वह स्वयं को परम सौभाग्यशाली समझती । मारदिन उन सभी पुरुषों में अपवाद
था, जिनके गुणों का बखान रोनू की मण्डली का नित-कर्म था। रोनू मारदिन पर आँख मूँद
कर भरोसा करती थी। भरोसा नहीं करने का कोई वजह उनके पास नहीं था। इतने वर्षों में
मारदिन के चरित्र पर कभी कोई प्रश्न चिह्न नहीं लगा। न रोनू ने कभी अपनी आँखों से
कुछ देखा न किसी और की जुबानी कुछ सुना। मारदिन का स्वभाव इतना सरल और सपाट था कि
उसमें टेढ़ापन कहीं टिक नहीं पाता। इसीलिए शायद रोनू ने अपनी मण्डली की किसी भी
सभा-समारोह में कभी पुरुषों की आलोचना नहीं की। क्योंकि उन्होंने मारदिन के रूप
में एक आदर्श पति और पुरुष पाया था। अत: पुरुषों के प्रति उनकी धारणा सदैव औरों के
विपरीत ही रही। रोनू का परिवार वो आसमान था जहाँ दोञ्यी और पोलो सहित उनके तीन
सितारे सुरक्षित खिलखिलाते-टिमटिमाते रहते। पर यूँ राह चलते, भटकते. काले घने
बादलों के मुसाफिर कब उस आसमान पर छा जाए यह कौन जानता था?
ईटानगर का मौसम की फितरत भी बंजारों जैसा है।
मौसम विभाग भी अनुमान लगाने में विफल कि वह कब कौन रूप धर ले।उमस से परेशान, हवा
का आनन्द लेने बैंक तीनाली से स्कूटी में निकलो, गंगा पहुँचते ही बूंदों के समन्दर
में डूब ही जाओ। वहीं भीगने से बचने को रैन कोट पहनकर निकलो तो एक मील चलने के बाद
चिलचिलाती धूप में झुलसकर मर जाओ। आदमी करें तो क्या करें? किस मौसम के हिसाब से
स्वयं को तैयार रखें?रोनू का जीवन भी ईटानगर का मौसम हो गया था। उस एक अयाचित घटना
ने जीवन और पुरुष के प्रति रोनू का दृष्टिकोण ही बदल कर रख दिया।
साफ
उजले आसमान से जो गाज गिरा था, रोनू उसके लिए कतई तैयार न थी। उसे यकीन होने में
बहुत लम्बा वक्त लगा कि मारदिन अब वो नहीं रहा, जिन पर उसे नाज़ था। अपनी मण्डली
में पुरुषों के इतने चारित्रिक हनन होने पर भी वह आश्वस्त रहती थी। पर अचानक
उन्हें अपना सम्पूर्ण जीवन एक धोखा सा लगने लगा। जिस विश्वास और आश्वासन के सहारे
सपनों का सुन्दर संसार बसाया था, बेवफाई की आंधी में उजड़ गया। रोनू को एहसास होने
लगा, वह एक भयानक गलतफहमी की शिकार बनी हुई थी।
इस ट्रैफिक में फँसी रोनू की उदास आँखों में
एक-एक दृश्य अब उभरता और चला जाता। आज उसे समझ आया कि कैसे पुराना मारदिन
धीरे-धीरे नये रंग और ढंग में ढलता जा रहा था। उसकी आँखों और बुद्धि पर
अन्ध-विश्वास की ऐसी पट्टी बंधी थी कि मारदिन की मूरत और सूरत कभी संदिग्ध लगी ही
नहीं।मोयिर ने जरूर भाँप लिया था। कितनी बार अप्रत्यक्ष रूप से आगाह भी किया था कि
मारदिन में अब वे लक्षण दिखने लगे हैं। लेकिन रोनू कैसे मान सकती थी, उलटा फटकारने
लगती –
“क्या अनापशनाप बकती हो मोयिर बाईदो? कृपया
मेरे दिमाग में ऐसी बातें न डाले जिसका कोई प्रमाण ही न हो! वैसे भी मुझे मारदिन
पर पूरा-पूरा भरोसा है। वो मेरे साथ छल कभी नहीं करेंगे। कभी नहीं।”
“हाँ-हाँ...! मैं कौन होती हूँ आपके दिमाग में
ज़हर घोलने वाली। आप बहुत भोली हैं। आपकी आँखें वो नहीं देख रही जो मेरी आँखे देख
रही हैं। आप वो महसूस नहीं कर रही है, जो मैं महसूस कर रही हूँ।”
मोयिर की इन बातों से रोनू चिढ़ जाती। वह सोचती,
“मनहूस औरत....! जिस आदमी के साथ चौबिसों घंटे व्यतीत करती हूँ, जिसके साथ मैं
बिस्तर साझा करती हूँ...मैं उन्हें नहीं देख पा रही, उनमें आए परिवर्तन को महसूस नहीं
कर पा रही?...कैसी पागल औरत है?”
अब वह जान चुकी थी कि अनुभव-ज्ञान कितना सत्य
और प्रामाणिक होता है। पुरुषों के छद्म रूप को पहचानने की कला मोयिर के पास थी।
कितनी नादान थी रोनू। वह पछताती....अपनी नादानी को कोसती। वह क्यों समझ नहीं पायी
थी, मारदिन पहले की तरह अपना काम निपटाकर सीधे घर क्यों नहीं आता था। क्यों बिन
बताए रात-रात भर घर से बाहर रहने लगा था। पूछो तो कहता कि दोस्तों के साथ है। वह
क्यों नहीं देख पायी थी कि मारदिन अपना मोबाईल फोन के लिए ऑवरप्रोटेक्तिव हो गया
था? अपने ही बच्चों के पहुँच से उसे दूर रखने लगा था। वो क्यों नहीं समझ पायी थी
कि मारदिन पहले की तरह एक साथ बिस्तर पर सोने को नहीं चढ़ता। अब रोनू और बच्चों के
सो जाने के बाद ही वह बिस्तर का कोई कोना पकड़ लेता था। वह क्यों नहीं देख पाई कि
मारदिन अब घर से जल्दी निकलने को बेताब रहता और लौटते वक्त जैसे उनके पैरों में
पत्थर बाँध दिये गए हो। उनकी अक्ल तब कहाँ घास चरने गयी थी....?मोयिर यही तो
समझाने का प्रयास कर रही थी।
मनुष्य को मनुष्य ही बने रहना चाहिए। भगवान
बनने के बाद वह इन्सान की पहुँच से दूर हो
जाता है। रोनू ने भी पति को परमेश्वर मानने की भारी भूल की थी। नतीजा यह हुआ,
मारदिन भी उनके हाथों से निकल गया। पति को परमेश्वर बनाने की इतनी महंगी कीमत उनको
चुकानी पड़ी।
रोनू ने कही-सुनी बातों पर कभी यकीन नहीं किया।
लेकिन उनका अविश्वास करने का और कोई वजह नहीं रह गया था। जब स्वयं उनकी बहन उन्हें
यह खबर दे गयी कि उन्होंने मारदिन को किसी और के साथ देखा है। यदि किसी और ने यह
बात कहीं होती तो रोनू की लताड़े सहनी पड़ती। लेकिन सगी बहन रोयुम की आँखों देखी खबर
पर वह यकीन किये बगैर न रह सकी। इतना भद्दा मज़ाक कोई अपनी बहन से भला क्यों करती? रोनू
के पैरों तले की जमीन खिसक गई थी। जाने क्यों उनका मन मानने को इन्कार कर रहा था
कि रोयुम ने अभी जो भी कहा वह सच है। उनके मन-मन्दिर में अब भी मारदिन का
निष्कलंक-निष्कपट मूरत विराजमान था। बहन को यकीन दिलाने के लिए रोयूम ने सबूत के
तौर पर और तथ्यों की पेशकश की-
“दीदी, मुझे पता है, आपको यकीन नहीं हो रहा है।
मुझे भी नहीं था। किसी को यकीन न होगा। लेकिन जो दृश्य इन आँखों ने स्वयं देखी हो
उसे कैसे भ्रम मान ले? आपको याद है, चार दिन पहले जीजाजी ऑफिस की मीटिंग के लिए
गुवाहाटी गये थे। संयोग से मैं भी उस वक्त बेटी की अपोलो अस्पताल में रूटीन चेक अप
के वास्ते वहीं पर थी। गुवाहाटी की गर्मी तो आप को पता ही है। उससे चन्द पल निजात
पाने को मैं बेटी के साथ सीटी सेन्टरमॉल गयी। वहीं पर मैंने जीजाजी को उस लड़की के
साथ देखा। जिस तरह दोनों एक दूजे में मग्न थे, देखकर एक बच्चा भी बता दे कि वे एक
दूसरे के लिए क्या है। उनसे नज़रे बचाते हुए बेटी को लेकर मैं वहाँ से निकल पड़ी।
सोचा था उसी पल आपको फोन कर लूँ। पर ऐसी गम्भीर बातें फोन पर नहीं बताई जाती।
इसलिए आज मैं साक्षात आपको बताने आई हूँ।”
रोयुम का आँखों देखा बयान और मारदिन के व्यवहार
तथा दिनचर्या में आये परिवर्तनों का अवलोकन करती रोनू इस दिल चीर देने वाले
निष्कर्ष पर आ पहुँची-
“धोखा! इतना बड़ा धोखा! मेरे जीवन भर की ईमानदारी
और समर्पण का यह सिला! सारे सगे संबंधों और जगत भर के लोगों से बढ़कर जिन्हें अपनी
पलकों पर बिठाया, दोञ्यी-पोलो और चेतुमबोतअ का आशीर्वाद स्वरूप मानकर पूजा की, जिन
पर प्राण निछावर किया उसी ने मेरे प्रेम और विश्वास का गला घोंट दिया।”
संयम की अन्तिम सीमा तक स्वयं को संभालकर रोनू
ने मारदिन से इस कठोर निर्णय का कारण जानने का बहुत प्रयास किया। पर जवाब में रोनू
को मिलती – चुप्पी। उनके संयम के हज़ार टुकड़े कर देने वाली एक गम्भीर चुप्पी। जब
तीन बच्चों के सौगन्ध दिलाई तब मजबूरन मारदिन ने जुबान खोली-
“मुझे पता नहीं...ये सब कब...और कैसे हो गया?
पर जो हो गया सो हो गया। मैं उसे अब छोड़ नहीं सकता।” मरदिन ने उत्तर देते हुए अपना
इरादा भी स्पष्ट बता दिया।
“तो मैं क्या हूँ?
बोलो...अब मैं तुम्हारी क्या हूँ?”
“तुम वही हो, जो पहले थी।
तुम वही रहोगी सदा।”
“और वो? वो भी रहेगी
सदा?”
“हाँ, वो भी रहेगी।”
“अगर मैं कहूँ कि मैं यह नहीं होने दूंगी- तो?”
रोनू ने अब तक अपने आप को, संयम की जिस डोरी से बाँधे रखा था, वह धीरे-धीरे टूटता
सा महसूस होने लगा।सहसा उनकी जुबान ऊँची और कड़वी होती गई। सुर्ख पड़ती आँखों से
आँसुओं को बहने से रोके बिना रोनू कहती गई –
“तुमने आखिर साबित कर ही दिया न कि सारे मर्द
एक जैसे होते हैं। मैं पूछती हूँ, एक पत्नी के रूप में, मुझमें ऐसी कौन सी कमी
तुमने देखी, जिसकी पूर्ति के लिए तुमने उस रांड के साथ....!” रोनू ने अपनी बात
पूरी की ही नहीं कि मारदिन भड़क उठा-
“जबान संभाल कर बात करो रोनू। वो मेरी दूसरी
बीवी है। मेरे जीवन में जो स्थान तुम्हारा है, वही स्थान उसका भी है। उनके खिलाफ
एक भी अपशब्द मैं बर्दास्त नहीं करूंगा।”
पर रोनू भी आज चुप बैठने वाली नहीं थी।
उन्होंने जीवन पर्यंत सादगी और संयम का चोला यूँ नहीं पहन रखा था कि उसका अधिकार
और आत्मसम्मान दाँव पर हो और वह गूँगी बनी बैठी रहे। आज वह मारदिन से अपनी सेवा,
समर्पण और त्याग का हिसाब माँगकर ही रहेगी। जिस दिन से मारदिन से उनकी लगन लगी, तब
से एक भी मर्तबा ऐसा न आया होगा जब रोनू ने उनका ख्याल न रखा हो। शारिरिक हो या
मानसिक, यहाँ तक कि आत्मिक स्तर की हर जरूरतों को रोनू ने पूरा किया। रोनू ने
पतिव्रता कहलाने की जितने सोपान हैं, सभी को सहजता से पार किया। पत्नी धर्म का
पालन करती हुई रोनू की नीयत कभी नहीं डगमगाई, कभी भी नहीं। आज उनकी ईश्वर प्रदत्त
गुणों के बदले उन्हें छल ही हासिल हुआ तो वह क्योंकर चुप रहती। मारदिन की आँखों से
आँखें मिलाती हुई वह भी दहाड़ने लगी-
“बहुत तकलीफ हो रही है? समाज में ऐसी स्त्रियों
को इसी नाम से पुकारा जाता है। जो स्त्री किसी शादीशुदा मर्द से प्रेम करे, उसकी
खुशहाल परिवार में आग लगा दे, ऐसी स्त्री कभी भी सम्मान की अधिकारिणी नहीं हो
सकती।......मैं फिर से पूछती हूँ, मुझसे ऐसी कौन सी भूल हो गई? मेरे प्रेम, सेवा
और समर्पण में कहाँ कमी रह गई? घर सम्भालने में मुझसे कोई चूक हो गई? क्या
तुम्हारे घरवालों को, तुम्हारे रिश्तेदारों को मैंने अपने जीवन का हिस्सा नहीं
माना? क्या मैंने तुम्हें संतान सुख से वंचित रखा? क्या मैं बिस्तर में......”
“बस करो रोनू। पागल हो गई
हो तुम?”
“मैं पागल नहीं हुई। पागल
तुम बना रहे हो मुझे। तुम बताते क्यों नहीं कि तुमने ऐसा क्यों किया?”
“मेरी समझ में नहीं आ रहा कि तुम क्यों इतने
उत्तेजित हुई जा रही हो? संभालों अपने आप को। मैंने उसके साथ रिश्ता अवश्य जोड़
लिया, पर तुम्हारे साथ रिश्ता तोड़ा तो नहीं न। मैं अब भी तुम्हारा पति हूँ। तुम भी
हमेशा मेरी ही पत्नी कहलाओगी। यह सत्य मृत्य की तरह अटल है। और तो और, तागिन समाज
के इतिहास में क्या मैं अकेला हूँ जिसने दूसरी शादी की हो? तुम क्यों भूलती हो कि
बहु विवाह हमारी संस्कृति का, हमारी परम्परा का एक अभिन्न अंग है। दूसरा विवाह
करके मैं किसी कुप्रथा का मार्ग प्रशस्त नहीं कर रहा हूँ। मैं तो वो कर रहा हूँ जो
हमें पुरखों से विरासत में मिला है। इस सत्य को तुम भी आत्मसात कर लो तो सब को
शान्ति मिले।”
रोनू को यकीन नहीं हो रहा था कि यह वही मारदिन
है जिनके नाम का जाप वह पूजा-अर्चना जैसा करती थी। उन्हें विश्वास होने में कितनी
कठिनाई हो रही थी कि आधुनिक मारदिन का शरीर वास्तव में एक आदिम मानव का घर है जो
इन विचारों के रूप में बाहर आया था।मनुष्य का मन आसमान सा असीम, सागर सा अगाध और
रहस्य के कितने परतों में विभाजित है। हमें लगता है कि हमने उन्हें समझ लिया, पर
उनके भीतर अनगिनत बातें छुपी होती, जो अज्ञेय हैं। रोनू भी समझती थी वह अपने पति
का सर्वस्व जानती है- भीतर भी, बाहर भी। लेकिन आज उसे एहसास हुआ कि उसके सामने खड़ा
मारदिन तो कोई और है – बिल्कुल अजनबी।
रोनू को लगने लगा, जैसे वे जीते जी मर गई। आवेश
में आकर ठान लिया कि उनके हाथों तीन लोगों की जान जानी है अब। पहले मारदिन, दूसरा मारदिन
की नयी स्त्री और तीसरा स्वयं उसकी। जिन्होंने उनकी खुशियों के साथ खिलवाड़ किया
उन्हें भी जीने का कोई अधिकार नहीं। रातों रात उसने तीन लोगों के कत्ल की सारी
योजनाएं बना डाली। कब, कहाँ और कैसे – इसकी तैयारी कर ली थी, जेहन में। लेकिन उन
तीन मासूम चेहरों का ख्याल आते ही उसका हौंसला पस्त हो गया। ज्वालामुखी फटने से
पहले पुन: सुप्त हो गया आदिम गहराईयों में। वे अपने कलेजे को ठंडक पहुँचाने के लिए
कुछ भी करेंगी लेकिन तीन बेकसूरों को अनाथ बनाकर नहीं छोड़ सकती। यह पाप है! घोर
अपराध है! इस सृष्टि में सबसे अभागे वे हैं जिनके सर से माता-पिता के साएं मिट
चुके हैं। वह दुनिया से इतना बड़ा कलंक लेकर नहीं जा सकती। वह जियेगी। मर कर ही
सही, पर जियेगी ज़रूर। जीते जी अपनी संतानों की खुशियों पर वे आँच नहीं आने देगी।
रोनू की सबसे बड़ी बेटी दिमुम अब थोड़ी सँयानी हो
गई थी। उसने आँखों को पढ़ने की कला सीख ली थी। पिछले कई दिनों से वह देख रही थी कि ‘आनअ’१
की आँखें न जाने कितना कुछ कह रही थी। वह मुस्कुराने की कोशिश करती, पर आँखों से
चमक गुम रहती। यूँ खामोशी में काम करते-करते उनमें पानी छलक आता। कभी उन सफेद और
काली पुतलियों में लाल-लाल रेखाएँ उभर आतीं। कभी वह इतनी सूजी हुई दिखाई पड़ती।
दिमुम को आभास हो गया था कि आनअ के साथ कुछ तो गलत हो रहा है। उसे इस नतीजे पर
पहुँचने में देर नहीं लगी कि ‘आबू’२ और आनअ एक दूसरे से खुश नहीं है।
इसलिए दोनों अलग-अलग रहने लगे हैं। उसने कई बार रोनू की मण्डली की सभा में होती
परिचर्चाओं को सुना है। उसके अविकसित अचेतन मन में अनायास ही कई सारी गूढ़ बातें
बैठ गयी थी। उन्हीं के आधार पर दिमुम के अबोध मन में अपने आबू के लिए नवीन धारणाए
बनने लगी। उन्हें अपने आबू पर गुस्सा आने लगा था।आबू का इस तरह रोज़ रोज़ घर से गायब
रहना उसे अच्छा नहीं लगता।सातवीं कक्षा मे पढ़ने वाली दिमुम ने एक दिन आनअ से पूछ ही
डाला –
“आनअ! आबू को क्या हुआ है? आजकल वह घर पर क्यों
नहीं रहते?”रोनू असमंजस में पड़ गयी। उन्हें कुछ न सूझा कि बेटी को क्या बताएँ। झूठ
वह बोल नहीं सकती और सच कतई नहीं बोलना चाहती।झुठ बोलकर बेटी को अन्धेरे में नहीं
रखना चाहती। और सच बोलकर बेटी के मन में अपने आबू के प्रति जहर नहीं घोलना चाहती।रोनू
के लिए मारदिन का सच गले का काँटा बन गया था। न निगलते बनता, न उगलते बनता था।बेटी
की ज़िद से हारकर रोनू ने बहुत ही नपे तुले शब्दों में बताया-
“तुम्हारे आबू को उनके ऑफिस से बहुत बड़ा काम
दिया है जिसके लिये उन्हें शहर से बार-बार बाहर जाना पड़ता है। इसलिए आजकल वह घर पर
कम रहने लगे है। इससे आगे और कुछ न पूछना। बड़ों के मामलों में बच्चे इतना दखल
अंदाजी नहीं करते।” इस उत्तर सेदिमुम कतई भी सन्तुष्ट नहीं हुई। उसे मालूम है कि
आनअ बहुत कुछ छुपा रही है। वह सच उगलने से कतरा रही है। पर वह आनअ से जोर जबरदस्ती
नहीं कर सकती। जिस सच को बताने में आनअ को इतनी तकलीफ हो रही है, वह सच जरूर कड़वा
ही होगा। और उस कड़वाहट का संबंध जरूर आबू से ही होगा। उन्होंने मन ही मन कई सारी
विश्लेषण करके यह निष्कर्ष निकाला –
“आनअ! आबू अच्छे आदमी
नहीं है न?”
रोनू ने बेटी को सीने से
लगाते हुए कहा- “ऐसा नहीं कहते बेटी। अपने आबू के बारे में ऐसा नहीं कहते।”
रोनू ने समझ लिया कि दिमूम समय से पहले बड़ी हो
रही है। इस परिस्थिति में उनका घर पर रहना उसके मानसिक स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं
है। घर में तनाव का जो माहौल है, वह सबको अपने चपेट में ले रहा है। दिमूम पर उसका
प्रभाव स्पष्ट दिखने लगा था। दिन्सोम और दिन्दो की भी बारी आयेगी। उम्र के जिस
चौखट पर उसकी सन्तान खड़ी है, वहाँ उन्हें हँसी और खुशी ही मिलनी चाहिए। इन बासी
हवाओं से वे उनका मन दूषित नहीं कर सकती थी। रोनू ने निश्चय किया, मारदिन और उनके
बीच जो भी तकरार है, उसकी भनक तक बच्चों को नहीं लगने देगी,इसलिए तीनों बच्चे, घर
से दूर हॉस्टल में रहेंगे।
जिस दिन यह खबर मारदिन के परिवार वालों को
मिली, सबने न जाने कितने राय के पर्वत खड़े कर लिये। मारदिन की माँ ने तो हाय तौबा
मचाते हुए रोनू के विरुद्ध कितना कुछ कह डाला-
“आखिर झगड़े किस घर में नहीं होते। भला
बताओ...पति-पत्नी कभी बिना लड़े रह सके है? लेकिन उसकी सज़ा बच्चों को देना कहाँ की
अकलमन्दी है? अपनी ही संतानों को अपने से दूर रखकर वह कौन सा पूण्य कमाना चाह रही
है? हाय हाय....ये आजकल की माएँ, अपने चैन और सुविधा के लिए बच्चों का सुख छीनने
में परहेज नहीं कर रही।”
यह वही सासू माँ थी जो रोनू की प्रशंसा करते
नहीं थकती थी। उनके लिए रोनू महज एक बहू नहीं थी। वह तो आसमान से उतरी साक्षात
दोञ्यी-पोलो की बेटी थी जो उनका परिवार सँवारने आई थी। बहू के रूप में उन्होंने
बेटी पाई थी। लेकिन उनके लिए अब रोनू एक असफल बीवी है जो अपने पति को अपने पास न
रख सकी और अब बच्चों को भी घर से दूर भगा रही है। जब मारमी ने अपनी भाभी की
तरफदारी करके माँ से पूछा कि “आखिर भईया ने ऐसा क्यों किया? भाभी जैसी अच्छी
स्त्री उन्हें और कहाँ मिलेगी?” उन्होंने उत्तर में कहा था –
“बेटी! स्त्रियों की त्रिया चरित्र के बारे में
तुम क्या जानों। स्त्रियों के ढोंग के आगे तो अच्छे से अच्छे कलाकार भी विफल है।
बाहर से चाहे जितनी भी सुशील और शरीफ लगे, भीतर कौन कैसी है, यह तो दोञ्यी-पोलो ही
जाने। अब किसी के घर के चारदीवारों में आँख और कान लगाकर कौन बैठा रहे? कुछ तो ऐब
ज़रूर होंगी। नहीं तो ऐसा कठोर कदम कोई क्यों उठाता?”
उस दिन से साँस-बहू की रही-सही आत्मीय डोर भी
टूटने लगी थी।रोनू ने जिन परायों को अपनी दुनिया माना था, पल भर में फिर पराये हो
गये। रोनू ने कितनी दफा ससुराल वालों के आगे दामन फैलाई कि मारदिन को उस स्त्री की
चंगुल से आज़ाद करने में सहायता करें। सबने अपनी अपनी तरफ से प्रयास भी किये पर मारदिन
का फैसला पत्थर पर लकीर था। वो जहाँ था वहीं अडिग रहा। यह बात अलग है कि उनपर और दबाव
डाले जाने की पूरी-पूरी संभावनाएँ थी। लिहाजा, उनसे से भी अब रोनू को कोई आस न रही।
इस मोह-भंग से रोनू का ह्रदय भी पत्थर हो गया। अब न वे इधर आते न रोनू उधर जाते।और
अपने बच्चों के हित में सोचने और करने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ उसका था। यह
अधिकार उससे कोई छीन नहीं सकता। बहुत मशक्कत के बाद रोनू अपने प्राण प्यारे तीनों
बच्चों को हॉस्टल रखने में सफल हुई।
बच्चों के हॉस्टल चले जाने से घर वीरान हो गया।
घर के चारों तरफ एक दिल दहला देने वाली खामोश चीख गूँजती रहती।रोनू की उदास आँखे
घर के हर एक कोने का दौरा करती। कितने प्रेम से इस घर को घर बनाया था। अपनी आत्मा
इसकी एक-एक ईट और पत्थर में बसाया था। यह घर नहीं बल्कि सपनों का सुन्दर संसार था,
जहाँ खुशियाँ अटकेलियां किया करती थीं। जहाँ दर्द और गम के लिए कोई जगह नहीं थी,
पर अब यह घर रोनू को एक कब्र सा लगा। जहाँ दफन है उसकी जिन्दा लाश! उसकी जिंदगी उदासीनता
में तब्दील होती गई। वह पहले की तरह झाड़ू-पोछा लगाती, चौका-बासन करती, हर कमरे को
सजाती-सँवारती, फूलों की देख रेख करती,
कपड़े धोती, सुखाती, इस्तरी करती फिर कपबॉर्ड में सहेजकर रखती। पर बस करने मात्र को
कर रही थी वह। किसी तरह समय तो बीते। फिर भी उसे लगता कि समय कही अटक सा गया है,
बीतने का नाम ही नहीं लेता।
रोनू को ऑफिस के बहाने घर से बाहर निकलना अच्छा
लगने लगा। ऑफिस पहुँचने से पहले ईटानगर की ट्रैफिक जाम में यूँ घंटों फँसे रहना
अच्छा लगने लगा।उन्होंने जाम में फँसकर बेख्याली सी खिसकते जाने को अपनी आदत बना
ली। ऑफिस पहुँचों तो अन्य महिला सहकर्मियों की कभी न रुकने वाली कथा-कहानियाँ
परेशान करती। लँच ब्रेक के बहाने यूँ जमघट सजाना और फिर शुरू हो जाना, इसकी-उसकी
चुगलियाँ करना और लोगों के नाज़ायज संबंधों पर विशेष टिप्पणियाँ देना। उनके साथ
रहकर रोनू को लगता जैसे उसके ताजे घाव पर नमक छिड़का जा रहा हो। वह लाख कोशिश करती
उनसे दूर रहने की, मगर एक ही कमरे और छत के नीचे काम करते उससे भागा भी नहीं जा
सकता। ऑफिस की बेमिसाल कोलाहल और घर की अनन्त नीरवता, दोनों ही रोनू के लिए असहाय
हो गया था।ट्रैफिक जाम में फँसे रहने से दोनों से निजात पाती वह।
ऑफिस से लौटते वक्त गंगा बाज़ार की सड़क के दाएँ
तरफ बना क्लॉक टाँवर की ओर रोनू की नज़रे अनायास टिक जाती। कहा जाता है कि वर्षों
पहले भूतपूर्व मुख्य मंत्री मुकुट मिथी ने इसे बनवाया था। दो हज़ार बीस तक आते-आते
वह अब भग्न अवस्था में था। कितनी सरकारे आईं और गईं, कितने लोग गद्दी पर बैठे और
उतरे, पर किसी ने उसके पुनर्निर्माण की जेहमत नहीं उठाई। सुनने मे आया है कि मौजूदा
सरकार ने नये सिरे से निर्मित करने का ऐलान किया है। उसकी सुईयाँ न जाने कितने
बरसों से सात पच्चीस पर अटकी हुई थी। पर किसी को क्या पड़ी थी? गंगा बाज़ार तो अपनी
ही भाग और दौड़ में व्यस्त था। कोई कही रुके तो रुके, अटके तो अटके। न जाने रोनू को
क्यों वह ठहरी हुई सुईयाँ और अपना अस्तित्व की गुहार लगाता वह क्लॉक टॉवर अपना सा
लगता?
तभी उनके पीछे तीन चार
गाड़ियों को छोड़ कतार में लगी एक ट्रक में लगी स्पीकर से घोषणा हुई –
“ईटानगर के वासियों हम अखिल अरुणाचल प्रदेश
छात्र संघ की ओर से बोल रहे हैं। आप सभी के लिए एक सूचना है। आप सभी को मालूम है
कि हाल ही में सम्पन्न हुई अरुणाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा में पेपर की
खरीद फरोख्त का मामला सामने आया है। इस घोटाले में हमारे प्रदेश के कितने होनहार
और इमानदार परीक्षार्थियों के साथ अन्याय हुआ है। इस घिनौने अपराध में जो भी शामिल
है उनके खिलाफ सख्त कार्यवाही होनी चाहिए। हमने सरकार से कई बार अपील की है कि
घोटाले में शामिल लोगों के नाम सार्वजनिक कर दी जाए और कानून के तहत उनको सज़ा भी
मिले। मगर सरकार ने हमारी न सुनी। ऐसी स्थिति में भी वे राजनीतिक रोटियाँ सेंकने
में लगी है। इसलिए हम आगामी दो दिनों के लिए समस्त राजधानी क्षेत्र में बन्द का
ऐलान करते हैं। यदि सरकार ने तब भी चुप्पी साधी, तो यह बन्द अनिश्चित काल के लिए
बढ़ाई जाएगी। इसलिए आप सभी से अनुरोध है कि इस बन्द को सहयोग देकर भ्रष्टाचारियों
के खिलाफ लड़ने में हमारा साथ दे!”
शाम होते-होते ईटानगर शहर का सारा बाज़ार
खरीददारों से आबाद होने लगा। मानों आज के ही आज सारा बाज़ार खरीद डालेंगे। अनिश्चित
काल तक बन्द की अवधि बढ़ने की संभावना से सब आतंकित हो उठे। कितनों ने इस बन्द के
ऐलान पर तालिया बजाईं। कुछ दिनों तक उन्हें मुफ़्त में छुट्टी जो मिलने वाली थी। दुकानदारों ने
सरकार को कोसने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ा। आगामी कुछ दिनों के नुकसान की भरपाई
कौन करेगा? सबसे ज़्यादा परेशान रोनू थी।
रोनू ने दिन की गिनती की। आगामी दो दिन तो
गुरुवार और शुक्रवार है। फिर शनिवार और रविवार। यानी चार दिन उन्हें अपने घर पर बन्धक बनकर गुज़ारना होगा। यह सोचकर वह घबरा गई।
चार दिनों के बाद बन्द की अवधि समाप्त न हुई, तो वह क्या करेगी?
अन्य लोगों की तरह खरीददारी पूरी करके रोनू भी घर आ पहुँची। उसके जीवन का सबसे विकट ट्रैफिक जाम तो घर में ही लगा हुआ था। उसका घर वह स्थल है जहाँ समय कछुओं का नस्ल बन जाता। यहाँ एक-एक पल एक-एक युग सा बीतता। वह गाड़ी से उतरी और सामान हाथ में ले लिए। कुछ पलों तक अपलक घर की ओर देखती रही और एक लम्बी-गहरी साँस भरकर घर के भीतर प्रवेश कर गई।


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